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वर्तमान में महिलाओं को अधिकारों से सुसज्जित करने पर बल दिया जा रहा है महिलाऐं भी अपने अधिकारों के प्रति सजग एवं प्रयत्नशील है अतः वे इस उद्देश्य की सिद्धि हेतु आन्दोलित भी है। हम स्तर पर महिला सशक्तिकरण वर्ष मना चुके हैं लेकिन महिलाओं की राजनैतिक स्थिति आज भी जैसी की तैसी है, उनकी न तो राजनीति में प्रभावी उपस्थिति है और न ही सत्ता में भागीदारी महिलाओं को चौके से संसद तक लाने की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन उनकी जिंदगी घर-परिवार, चूल्हें- चौके और ग्लैमर आर्टीकल तक ही सिमटी रहती है। महिलाओं की राजनीतिक डगर में, उनमें राजनैतिक चेतना की कमी के अतिरिक्त और भी ढेरों कांटे हैं। ’मनी, मसल्स और मैन - पॉवर की तिकड़ी ने आज हमारी समूची चुनाव प्रणाली को ध्वस्त करके रख दिया है। राजनीति में धन और अपराध के बढ़ते प्रभाव के कारण आज हमारा चुनावी तंत्र गड़बड़ा गया है फलस्वरूप आम लोगों का लोकतंत्र से विष्वास उठने लगा है। इस चुनावी प्रवृत्ति का दुष्प्रभाव महिलाओं की राजनैतिक डगर पर पड़ा है। धन-बल और बाहुबल के अभाव में महिलाएं चुनावी वैतरणी पार करने में असमर्थ होती है जिस कारण आष्वासन के बावजूद सत्ता में भागीदारी का सपना संमूर्तित नहीं हो पा रहा है। राजनीति के मूल्यहीन चरित्र के कारण आज संभ्रांत महिलाएं राजनीति के कुरूक्षेत्र में आने में संकोच करती हैं।
संसद में महिलाओं की संख्या के आधार पर भारत का स्थान विष्वभर में 65वां है। एशिया में तो भारत इस मामले में ग्यारहवें स्थान पर है। विष्व संदर्भ में देखें तो महिलाओं का सबसे अधिक प्रतिशत स्वीडन में राजनैतिक रूप से सक्रिय है। वहां के कुल 349 सासंदों में से 141 महिलाएं हैं अर्थात् वहां की राजनीति में महिलाओं का प्रतिशत लगभग 40.4 फीसदी है। इस मामले में सबसे नीचे मोरक्कों है जहां राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 0.6 फीसदी ही है। इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे अतिआधुनिक व विकसित देशों में भी महिला राजनीतिज्ञों की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। अमेरिका में 11.7 फीसदी, इंग्लैण्ड में 9.4 फीसदी, फ्रांस में 6.4 फीसदी और रूस में 10.2 फीसदी महिलाएं ही राजनीतिक पदों पर या व्यवस्थापिकाओं में हैं।
सन् 1992 में भारतीय संविधान संशोधन किया गया और त्रि-स्तरीय पंचायतराज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण और अलग से सुरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई। पंचायतों में महिला आरक्षण को एक शुरूआत माना गया था और तब सोचा गया था कि यह महिला आरक्षण - धीरे-धीरे संसद और राज्य विधानमंडलों तक में दिया जाएगा। सन् 1992 में सविधान में किए गए 72वेंऔर 73वें संशोधन 24 अप्रैल, 1993 से लागू हो गए थे। इस संशोधनों के बाद गांवों के पंचायती और शहरों के स्थानीय निकायों को भी संवैधानिक मान्यता मिल गई। संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किए गए इन अधिनियमों में व्यवस्था की गई थी कि शहरी निकायों व पंचायतों के चुनाव एक निश्चित समय पर कराए जाएगे और उनमें पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति व जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाएगा। इसके आलवा महिलाओं को प्रत्येक स्तर पर एक तिहाई स्थान दिए जाने का प्रावधान है। इससे भी आगे जाकर इस महिला आरक्षण कानून में प्रावधान है कि दलितों के लिए आरक्षित सीटों में भी दलित महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण मिलेगा।
Keywords:
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर स्थिति फिर भी बहुत सकारात्मक है, आशाजनक है और हम उस पर संतोष कर सकते हैं लेकिन निचले स्तरों पर स्थिति बेहद खराब है
Cite Article:
"भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी :एक विश्लेषणात्मक अध्ययन", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.3, Issue 11, page no.73 - 78, November-2018, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI1811011.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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