Scholarly open access journals, Peer-reviewed, and Refereed Journals, Impact factor 8.14 (Calculate by google scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool) , Multidisciplinary, Monthly, Indexing in all major database & Metadata, Citation Generator, Digital Object Identifier(DOI)
गिरिजाकुमार माथुर जी हिन्दी की नई काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं। उनके हृदय पर नौ वर्ष की अवस्था में ही काव्य काव्य-संस्कार पड़ चुके थे और वे ब्रजभाषा में कविता लिखने लगे। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में कवि सम्मेलनों वे भाग लेने लगे। ब्रजभाषा में कविता करने के उपरान्त कुछ दिनों तक छायावादी शैली पर भी कविताएं लिखते रहे। अध्ययनकाल के दौरान विक्टोरिया कॉलेज,ग्वालियर में आयोजित कवि सम्मेलन में आपकी छायावादी शैली की कविता सुनकर स्वयं माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था कि यदि तुम इस गीत के आगे अपना नाम न लिखकर महादेवी का नाम लिख दो, तो कोई पहचान नहीं सकता। इस ब्याज स्तुति को सुनकर छायावादी शैली पर रची समस्त कविताएं नष्ट कर दी तथा प्रण लिया कि मैं जब तक अपनी कोई मौलिक राह नहीं ढूंढ नहीं लूंगा, तब तक कोई कविता नहीं लिखूंगा। यह घटना सन् 1937 ई. की थी और तभी से आपने काव्य की परम्परागत राह को छोड़कर नूतन मार्ग अपनाने का संकल्प लिया। इसके उपरान्त माथुर जी ने नये प्रयोग भी आरम्भ कर दिये तथा सन् 1938 तक नये-नये प्रतीक ,नवीन उपमान आदि का प्रयोग करने में अपनी पहचान बना ली।
गिरिजा कुमार माथुर आधुनिक संदर्भों में नव काव्योन्मेष के सचेतन अध्येता और सजग दृष्टा रहे हैं। उनकी कविताओं का प्रधान स्वर सौंदर्य, प्रेम और तद्जनित पीड़ा,विषाद हैं,किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वे समसामयिक यथार्थ से कटे हुए हैं। उन्होंने आम आदमी की संवेदना को अपनी कविता में स्वर प्रदान किया है। उनके काव्य के आरम्भिक चरण में प्रेम,रोमांस,सौंदर्य एवं वैयक्तिक पीड़ा की अधिक अभिव्यक्ति हुई है,जबकि परवर्ती रचनाओं में व्यक्ति, समाज,प्रकृति,पृथ्वी,राजनीति, राष्ट्र, प्रेम और समग्र जीवन एक नए रूप में अभिव्यक्त हुआ है।
अनुभूति के विविध अन्य रूप
माथुर की कविताओं में संवेदनात्मक विविधता की झांकी दृष्टिगोचर होती है। वे अपने विस्तृत अनुभव को कविता के माध्यम से जन-जन की अनुभूति से जोड़ता चाहते हैं। संवेदना का कोई भी क्षण हो, वे शब्दों के द्वारा कविता में सुरक्षित रखना चाहते हैं। उनके काव्य में संवेदनात्मक विविधता के रंग नीचे प्रस्तुत है।
1 क्षणानुभूति
नई कविता का कवि क्षणानुभूति को अधिक महत्त्व देता है। वह किसी भी क्षण की अनुभूति को अपने शब्दों में बांधकर श्रोता और पाठकों को सराबोर करना चाहता है। आज के व्यस्त और कुंठा भरे जीवन में एक पल की खुशी भी कवि भोग लेना चाहता है, इसलिए कवि संवेदना का छोटा-सा अंश भी अधिकाधिक सम्प्रेषणीय बनाकर प्रस्तुत करना अपना कर्तव्य समझता है -
’’छिपती, दिपती, मद्धिम पड़ती
धुंधली, पूरी, फिर, कटी फांक
यह मैं
मेरा व्यक्तित्व बोध
क्षण-जीवन का उपभोग परम
पंखों सी गिरी शिलाएं
जिसकी चमकदार
$ $ $ $ $ $ $ $ $
चमको तुम मद्धिम चांद
अभी फिर बादल आएंगे
उड़ने दो रेशम बाल
कि क्षण इतिहास बनायेंगे।’’1
2 सांस्कृतिक चेतना
गिरिजा कुमार माथुर ने अपनी काव्य-रचनाओं में सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह सहेजा है। विदेशी संस्कृति के अंधानुकरण के कारण जीवन संवेदनाहीन और जटिलताओं में बंध गया है। विश्व भर में हमारी सांस्कृतिक श्रेष्ठता की पहचान है, परन्तु जीवन की विषमताओं के कारण हम अपनी पहचान भूलते जा रहे हैं। कवि अपने कवि-कर्म की सार्थकता इसी बात में समझता है कि हमारी संस्कृति अक्षुण्य बनी रहे। इसके लिए हर संभव प्रयासरत है। होली, दीवाली, ईद, दशहरा आदि त्योंहार हमारे धार्मिक उत्सव और संस्कृति के प्रतीक समझे जाते हैं, परन्तु कैबरे डांस, रात्रि पार्क भ्रमण तथा सिनेमा जैसे आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने इन उत्सवों को भूला दिया है। कवि की ’होली’ और ’नयी दीवाली’ कविता इसी प्रकार की कविताएं हैं जिनमें सांस्कृतिक चेतना के दर्शन किये जा सकते हैं -
’’ले वैभव का धान्य महालक्ष्मी घर-घर में उतरे
ऋद्धि सिद्धि से भरे ग्राम
नगरों में श्री-सुख बिखरे
मेरी इस सांवर धरती पर
सेना चाँदी बरसे
ऐसा दीपक जले कि जिससे
स्वर्ग धरा को तरसे।’’2
3. सामाजिकता की भावना
व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर ही अपना सर्वांगीण विकास करता हैं। परिवार समाज की अभिन्न इकाई है। उनकी रचनाओं में अनेक जगह पर सामाजिक समस्याओं का चित्रांकन देखने मिल जाता है। समाज में रह कर व्यक्ति को जीवन पर्यन्त अनेक सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है। एक कृषक पिता का अपने जीवन में अपनी बेटी के विवाह के सपने का बड़ा ही महत्त्व होता है। कवि ने किसान की इस अमूर्त संवेदना को में मूर्त रूप दिया है। कवि के शब्द संवेदना के धरातल पर व्यक्ति के मन को छू लेनेवाले हैं, यथा -
’’अचानक वे किसान
देखने लगे आसमान
हल्की-हल्की बदरी की फुहिया थीं
बोले,
बस कुछ थोड़ी छींटा-छाँटी हो जाय
बच जाय फसल ये ओलों से
अच्छे दाम बिक जाय
कुछ घर में भी आ जाय
अब की जेठ
इसी सरसों से बिटिया के हाथ पीले कराना है।’’3
Keywords:
माथुर ने राजनीति के हर पक्ष को अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं ओैर पाठकों के समक्ष रखा है। राजनीति में व्यक्ति के अवमूल्यन को अभिव्यक्ति देकर सत्तासीन नेताओं की पूरी सच्चाई सबके सामने बयान की है। जनसाधारण महंगाई की मार से कुंठित होकर लाचार और बेबसी में जीने को लाचार हैं। कवि ने सांकेतिक और सहज भाषा में अपना आक्रोश प्रकट किया है।
Cite Article:
"गिरिजा कुमार माथुर की काव्यात्मक अनुभूति", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.3, Issue 9, page no.234 - 238, September-2018, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI1809039.pdf
Downloads:
000205238
ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 8.14 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator