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मनुष्य “शब्दों से ही प्रसिद्ध“ रहने वाला प्राणी है। यह विचार ही दर्शन का मूल है। किसी भी विचार की महत्ता कभी समाप्त नहीं होती, चाहे वह कितना ही प्राचीन क्यों न हो। शिक्षा और नैतिज्ञ विचार का गहरा संबंध है। दर्शन हमारे जीवन के लक्ष्यों को निर्धारित करता है और शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। रवीन्द्रनाथ टैगोर आधुनिक युग के एक महान दार्षनिक और शिक्षाशास्त्री थे। उन्होंने अपने मौलिक और नए विचारों के माध्यम से भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। टैगोर ने भारतीय संस्कृति के आधार पर शिक्षा की नींव रखी और पूर्व तथा पश्चिम के आदर्शों को नए रूप में प्रस्तुत किया।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानना था कि शिक्षा को प्राकृतिक वातावरण में दिया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षा में प्रकृति को विशेष महत्व दिया। उनका विचार था कि बालक को जहाँ तक संभव हो, प्राकृतिक स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। उन्होंने सर्वोच्च शिक्षा को वह कहा है जो संपूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है। अध्ययन और अध्यापन के लिए स्वतंत्र और प्राकृतिक वातावरण को श्रेष्ठ मानते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1901 में बोलपुर नामक स्थान पर “शांति निकेतन“ नाम से एक विद्यालय की स्थापना की, जो बाद में विश्वभारती विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शांति निकेतन में रहते हुए उन्होंने “गीतांजलि“ नामक काव्य रचना की, जिस पर 1912 में उन्हें “नोबेल पुरस्कार“ प्राप्त हुआ। टैगोर नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे। उनके अलावा उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की, विभिन्न देशों का भ्रमण किया और अनेक विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिया। इन सभी कार्यों के माध्यम से उनकी ख्याति और भी बढ़ी। टैगोर ने भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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Cite Article:
"रवीन्द्रनाथ टैगोर का भारतीय वर्तमान शिक्षा प्रणाली में प्रासंगिकता का अवलोकन", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.9, Issue 4, page no.1161 - 1165, April-2024, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2404155.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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