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पं. दीनदयाल का विचार था, ”आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीढ़ी पर पहुँचे हुए व्यक्ति नहीं, बल्कि सबसे नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति होगा।“
वर्तमान युग में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आर्थिक विकास के विचार और प्रस्तावनाएं भारतीय समाज के आर्थिक विकास के लिए आज भी महत्वपूर्ण है। उनकी योजनाएं एवं विचार विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रांे में असमानता को कम करने, गरीबों को आर्थिक सहायता प्रदान करने और सामाजिक न्याय की स्थापना करने के लिए महत्वपूर्ण है।
वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता और आर्थिक दुर्बलता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। उपाध्याय जी की योजनाएं जैसे कि ”एक पंचायत एक बैंक, एक उपकेन्द्र“ गांवों को स्वावलम्बी बनाने की दिशा में आवश्यक है।
आज पश्चिमी अर्थशास्त्र केवल भौतिक समृद्धि बढ़ाने की दिशा में ही सोचता है परन्तु दीनदयाल जी की एकात्म अर्थनीति भौतिक समृद्धि के साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं संतोष प्राप्त करा देने वाली संजीवनी की तलाश करती है। दीनदयाल जी ने अपनी पुस्तक ”भारतीय अर्थनीति विकास की एक दिशा“ में एकात्म मानव के अर्थायाम की व्याख्या की है। समाज से अर्थ के अभाव व प्रभाव दोनों को मिटाकर उनकी समुचित व्यवस्था करने को अर्थायाम कहा है।
दीनदयाल उपाध्याय का आर्थिक विकास मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर आधारित था। उन्होंने अन्त्योदय योजना की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य गरीबों की स्थिति में सुधार करना और समृद्धि को सामाजिक न्याय के साथ बाँटना था। उन्होंने आर्थिक नीतियों के माध्यम से गरीबों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने का प्रयास किया और सामाजिक समानता की स्थापना के लिए कई योजनाएँ प्रस्तुत की। उनके आर्थिक विचार भारतीय आर्थिक विकास की दिशा को प्राथमिकता देने की दिशा में थे।
Keywords:
सामाजिक न्याय, एकात्म अर्थ नीति, एकात्म मानव, ग्रामीण विकास
Cite Article:
"आर्थिक विकास का पं. दीनदयाल उपाध्याय का दृष्टिकोण", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.8, Issue 8, page no.526 - 530, August-2023, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2308084.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
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