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कविता समाज की ध्वनि है। वह समाज में प्रचलित समस्त मनोभावों को शब्द देती है। वह उन संभावनाओं को जन्म देती है जिनसे समाज में शांति, सद्भाव और समानता की स्थापना होती है। यह स्थापना उन मूल्यों की व्याप्ति है जो किसी भी सामाजिक संकट की स्थिति का सामना अत्यन्त साहस के साथ कर सकती है। ऐसे में कविता का महत्त्व द्विगुणित हो जाता है। जब संरचना के स्तर पर कुछ बदलाव महसूस किए जाते हैं और कविता उन परिवर्तनों का मूल्यांकन करती हुई जड़ता को नष्ट करने की घोषणा कर देती है परन्तु शाश्वत और आवश्यक मूल्यों के पक्ष में समर्थन की स्वीकारोक्ति प्रदान करती है। यही कविता और समाज का अन्तःसम्बन्ध माना जा सकता है जिसके बल पर कविता, कविता होने की पूर्णता प्राप्त करती है।
हम सब को ज्ञात है कि कविता समाज से अन्योन्याश्रय भाव से जुड़ी है। समाज में जब भी कोई परिवर्तन होता है वह परिवर्तन कविता की आवाज बनता है। यह शोध लेख सन् 2000 से 2010 तक की कविता में निहित मूल्यों के परिवार सम्बन्धी दृष्टिकोण के सन्दर्भ से सम्बन्धित है। उपर्युक्त अवधि के मध्य भूमंडलीकरण अपने पूर्ण चरम के साथ प्रवाहमान है, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, बाजार, उपभोक्ता, जीवन, और समाज सब अपनी अपनी गति से वेगवान है। सामाजिक संबंधों में शिथिलता आई है। आजीविका के साधनों में बदलाव आया। लोगों के विचार शक्ति में भी परिवर्तन हुआ। स्त्री शिक्षा के प्रति जागरण से महिलाएं नौकरी करने लगी। सामाजिक सोच में परिवर्तन आया। जीवन मूल्य बदले। प्रगतिशील और विकसित व्यक्तित्व के लिए होड़ बढने लगी। किसी के भी पास समय नहीं। सब के सब अतिरिक्त के लिए प्रयास करने लगे। जनमानस में अर्थ की महत्ता बढने के साथ ही पुरातन पारिवारिक मूल्यों से लोगों का मोहभंग होने लगा। प्रचलित परिवार संस्था के प्रति भी उदासीन दृष्टिकोण बन गया। संक्रमण के इस माहौल में पहले से चले आ रहे पारिवारिक संस्कार अथवा मूल्य तो ध्वस्त प्रायः हुए ही जीवन को जीने का दृष्टिकोण भी इतना त्वरित हो गया कि हमारी संवेदनाएँ तथा उनसे जुड़ी कलाएँ सबसे अधिक आहत हुई।
इस सबके बावजूद भी इस युग की कविता ने निरन्तर विघटित मूल्यों को संवेदना के साथ मूल्यपरक बनाने में अपना योगदान दिया है। मानवीय अस्तित्व को संरक्षित करने के लिए हिन्दी कविता ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यथा -
हो सके तो हर धड़कन के साथ
एक अदृश्य तार जोड़ दिया जाए
कि एक को प्यास लगे
तो हर कंठ में जरा सी बैचेनी हो
अगर एक पर चोट पडे़
तो हर आँख हो जाए थोड़ी - थोड़ी नम
और किसी अन्याय के विरूद्ध
अगर एक को क्रोध आए
तो सारे शरीर
झनझनाते रहे कुछ देर तक 1
उपर्युक्त कवितांश में संवेदना की संभावना को बरकरार रखने के लिए भावनात्मक ध्वनि सुनाई पड़ती है। वसुदेव कुटुम्बकम् की भावना स्थापित करने का स्पष्ट आग्रह दिखाई पड़ रहा है।
यद्यपि जीवन की आपाधापी ने हमारी पारिवारिक संस्था को भी प्रभावित किया है। कामकाजी महिला एवं उसके परिवार में स्त्री - पुरूष संबंधों को भी कवि की सूक्ष्म दृष्टि अनुभव करती है। कार्यालय के कामकाज को लेकर बढ़ते तनाव, पारिवारिक दायित्वों, बच्चों के बड़े होने, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ समन्वय न होना, एकल परिवार को अच्छा मानना आदि ऐसे बदलावों ने मानव को अर्थवान तो बना दिया किन्तु संवेदना की दृष्टि से विघटित किया है। फिर भी कुछ ऐसा बचा था जिसने विघटित होते हुए परिवार को सम्बल दिया। एक दूसरे को समझने की शक्ति उत्पन्न की -
अब वक्त कम है टुकड़ों में मत बाँटों अपनी साँसे
दम दोनों का ही दम फूलता है
चाहे औरत हो या मर्द
और गुस्सा
बेवक्त की नींद पर आना चाहिए
एक दूसरे के उठने के समय पर नहीं 2
इस दशक की कविता में कुछ ऐसा भी दिखाई देता है, जहाँ हम बहुत कुछ को छोडकर आगे तो बढे है किंतु फिर भी बहुत कुछ आज भी हमारे भीतर इस कदर पैठा हुआ है जो बरबस ही हमें मध्ययुग की याद दिला देता है। आधुनिकता ने परिवार संस्था को क्षति पहुँचाई। संयुक्त परिवारों के टूटने की नींव डाली जा चुकी थी औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण ने तो इस रीति को और भी अधिक बढ़ावा दिया। भूमण्डलीकरण के प्रभावों से पारिवारिक मूल्य विघटित होने लगे। व्यक्तिवादी मूल्यों ने घरों में अपनी पहचान बढ़ा ली। विश्व से जूझने की मानसिकता भी हमारे भीतर स्थान बनाने लगी। इण्टरनेट के आगमन ने सारी दुनिया को हमारे छोटे से घर में ही कहीं कोने में रखे कम्प्यूटर में रच दिया था। टेलीविजन के माध्यम से देश दुनिया की खबरों ने हमें नवीन चेतना से समृद्ध कर दिया था। इस दौर में स्त्री शिक्षा को बढावा मिला। लड़कियों का शिक्षा के प्रति रूझान बना। सरकारी और गैर सरकारी कार्यालयों में महिलाओं का प्रतिशत बढा। स्त्री आत्मनिर्भर होने के साथ आर्थिक निर्णय लेने में भी सक्षम हुई। परिवार में एक नये मूल्य को जन्म दिया कि जो स्त्री सदियों से केवल पति की अनुगामिनी बनी रही। वह अपने परिवार में लिए जाने वाले निर्णयों के प्रति अधिक आत्मविश्वास से पूर्ण हुई। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई। सविता सिंह लिखती है-
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Cite Article:
"हिन्दी कविता में पारिवारिक मूल्य संक्रमण (सन्दर्भ - सन् 2000 से 2010 तक)", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2456-3315, Vol.8, Issue 7, page no.56 - 64, July-2023, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2307010.pdf
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ISSN:
2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 8.14 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator