IJRTI
International Journal for Research Trends and Innovation
International Peer Reviewed & Refereed Journals, Open Access Journal
ISSN Approved Journal No: 2456-3315 | Impact factor: 8.14 | ESTD Year: 2016
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Paper Title: भारत में मुस्लिम महिलाओ की स्थिति अवलोकन
Authors Name: डॉ. गीता कुमारी
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Author Reg. ID:
IJRTI_189612
Published Paper Id: IJRTI2301060
Published In: Volume 8 Issue 1, January-2023
DOI:
Abstract: मानवाधिकार व्यक्तियो के मौलिक अधिकार है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा एवं प्रतिष्ठा से संबंध रखता है जिसे संविधान द्वारा प्रदत्त किया जाता है या अन्तराष्ट्रीय नियमो के अनुसार समाहित है और न्यायालय द्वारा उसका पालन करवाया जा सकता है। मानव होने के साथ ही मानवधिकारो की प्राप्ति हो जाती है। मानवाधिकार वेे नैतिक सिद्धान्त है जो मानव व्यवहार से संबंधित कुछ निश्चित मानक स्थापित करता है। मानवाधिकार स्थानीय तथा अन्तराष्ट्रीय कानूनो द्वारा नियमित रूप से रक्षित होते है, किसी इंसान की जिन्दगी आजादी बराबरी का अधिकार ही मानवाधिकार है। भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गांरटी देता है बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है। ऐसे मौलिक अधिकार जिसके लिये व्यक्ति-व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हकदार है। यह वे नैतिक सिद्धांत है जो मानव व्यवहार से संबंधित कुछ निश्चित मानक स्थापित करता है। ये प्रायः आधारभूत अधिकार है, जिन्हे न छीना जाना योग्य माना जाता है ये व्यक्ति के जन्मजात अधिकार है ये अधिकार सदा और सर्वत्र देय है तथा सबके लिये समान है। भारत में महिलाओ की स्थिति ः- विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओ के सुदृढ़ होने के साथ-साथ अधिकारो की भी स्थिति सुदृढ की जाने लगी तथा महिलाओ को पुरूषो के समकक्ष लाने की मुहिम में तेजी आती गयी। एक महिला को महिला को महिला होने के कारण जो अधिकार प्राप्त है वही उसके महिला मानवाधिकार है, अब वह स्थिति अलग है कि महिला को अपने अधिकारो का कितना ज्ञान है या नही। भारत में देखा जाये तो सरकारी आंकडे सदैव महिला को पुरूषो की बराबरी के अधिकारो का दावा करते है। हर क्षेत्र में समानता को दिखाया गया है। समाज की बात करे तो समाज के ठेकेदारो का मानना है कि समाज में महिला को सभी अधिकार प्राप्त हो रहे है वह सुखमय जीवनयापन कर रही है परन्तु समाज में पितृसत्ता है जो अपनी सत्ता को बनाये रखना चाहते है। आजादी से अब तक देखा जाये तो महिलाओ को अधिकार प्राप्ति में उन्नति हुयी है लेकिन यह प्रतिशत बहुत अधिक या पूर्णतः नही है, कुछ क्षेत्रो में आज भी महिला गुलामी वाला जीवन जीन के लिये मजबूर है। भारत में महिलाओ के लिए अधिकारो की प्राप्ति के लिए लम्बे समय से संघर्ष चल रहा है। सदियो से भारत में पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, सती प्रथा, अधिकार विहीनता, रूढिवादिता समाज का अंग रहा है। महिलाओ के मानवाधिकारो की नियति इस मायने में निराशाजनक है कि उनके मूल अधिकारो का भारतीय समाज में और राजनीति की कुलपितागत संस्कृति का उल्लघंन है। महिला अधिकारो की रक्षा करना असंभव हो सकता है, चल रहे अपराध अधिकारो तक पहुंच सुनिश्चित करने के पहले उनको अस्तित्व को सुनिश्चित करना आवश्यक है। मुस्लिम महिलाओ की स्थितिः- भारत एक धर्म निरपेक्ष व सम्प्रभु राष्ट्र है यह किसी भी धर्म का सम्मान करने वाले दुनियाभर के लोगो का स्वागत करता है। यह सभी के साथ समानता का व्यवहार करता है। भारत एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक ओर गणतांत्रिक देश है। इसलिए भारतीय नागरिको को हमेशा समानता और न्याय का अधिकार है और अनुच्छेद 25 से 28 वास्तविक रूप से अधिकारो की रक्षा करता है। भारत में मुस्लिम आबादी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी अल्पसंख्यक आबादी है। 120 मिलियन की आबादी वाले भारत देश में मुस्लिम आबादी लगभग 12 प्रतिशत है। मुस्लिम समुदाय और विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओ के सापेक्ष पिछडे़पन को मुस्लिम आबादी के बीच देखी गई तुलनात्मक रूप से उच्च प्रजनन दर के एक कारक के रूप में जाना जाता है। यह लेख भारत में मुस्लिम महिलाओ की स्थिति से अवगत कराने व उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिये वास्तविकता से अवगत कराना है। भारतीय मुस्लिम आबादी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी और भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी है व भारती की प्रमुख अल्पसंख्यक है। भारतीय समाज में समय के साथ-साथ परिवर्तन हो रहा है उसी समाज में महिलाये भी आबादी का पचास प्रतिशत का हिस्सा है जिनके द्वारा विकाश में योगदान दिया जाता है वे हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही है परन्तु इसी के साथ एक हिस्सा जो मुस्लिम महिलाओ का है वह इस विकास से पिछड़ रहा है क्योकि उनको समाज का अलग हिस्सा माना जाता है। मुस्लिम महिलाओ को अधिकांशतः स्वतंत्रतापूर्वक जीवन नही मिलता है। पुरूष सदैव उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते है। मुस्लिम समाज में यहां स्थिति कुछ विशेष नही मानी जाती है क्योकि वहां महिलाओ को अपने लिये जीने का अधिकार नही दिया जाता है। मुस्लिम महिलाओ की सामाजिक स्थितिः- भारतीय समाज में पारिवारीक व्यवस्था में संबंधो के आधार पर महिलाओ का स्थान व भूमियो को अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक दोनो समुदायो में उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। समाज में उनको सदैव अधीन रहकर जीना पड़ता है। प्रथम रूप में पिता शादी के बाद पति और फिर पुत्र के अनुसार ही एक महिला का जीवन होता है। हिन्दू समाज में उसके पितृसतात्मक को सहन करना पड़ता है। मुस्लिम समाज में तो यह स्थिति और भी दयनीय है। मुस्लिम समाज में समाज के ठेकेदार मोलवी होते है उनके द्वारा ही सभी रीति रिवाज व संबंधो का वर्णत किया जाता है। इसलिए वे अपने अनुसार ही कुरान का वर्णन करते है। मुसलमान सदैव कुरान और हदीस के अनुरूप अपने आदर्श प्रस्तुत करते है तथा उनमें विश्वास रखते है। हालांकि भारतीय मुस्लिम समाज में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाये प्रतिबंधित है। वास्तविक रूप से देखा जाये तो जिन पर लॉ (कानून) लगाया जाता है वे इसक मायने जानती ही नही है, बहुत कम प्रतिशत महिलाअे मुस्लिम पर्सनल लॉ की जानकारी तक पहुंच पाती है। अन्यथा जो कानूनी मोलवी ही बताते है वही माना जाता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुस्लिम महिलओ के अधिकारो की व्याख्या कुछ भिन्न है। इस्लामी कानून मुख्य रूप कुरान की शिक्षाओ और पैगम्बर मुहम्मद की परम्पराओ (हदीस) पर आधारित है जो एक मुसलमान के जीवन भर का खाका तैयार करते है। इन शिक्षाओ और परम्पराओ की व्याख्याये विविध है और इस भिन्नता ने कई विधालयो और उपविधालयो को जन्म दिया है। भारतीय मुसलमानो द्वारा पालन की जाने वाली संस्कृति और परम्पराओ में उनकी भाषाओ, आदतो, प्रथागत नियमो और दृष्टिकोण सहित विविधता को वर्णित तार पाये जाते है। कुछ संहिता कारण के बावजूद, अधिकांश मुस्लिम कानूनी अभी भी असंहिताबद्ध है और उनका कच्चे रूप में पालन किया जाता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में पुरूषो और महिलाओ के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित करता है परन्तु इसमें अच्छा यह है कि मुस्लिम महिलाओ को विवाह करने की स्वतंत्रा प्रदान की गयी है। मुस्लिम विवाह को एक अनुबंध माना गया है जिसमें पत्नि की सहमति आवश्यक है और वह अपनीे मांगे भी निर्धारित कर सकती है। पत्नि को महर या मेहर का अधिकार है परन्तु इन सब के बावजूद बहुविवाह व तलाक के कानून सभी अधिकारो को खत्म कर देते है। महिला को प्राप्त अधिकार निरर्थक हो जाते है क्योकि मुस्लिम पुरूष को अधिकतम चार पत्निया रखने की अनुमति है, कुछ नियमो के अनुसार पांचवी शादी भी वह कर सकता है वह अमान्य नही होगी, केवल अनियमित होगी जिसे नियमित किया जा सकता है। एक मुस्लिम पुरूष की गैर मुस्लिम महिला से विवाह कर सकता है जबकि मुस्लिम महिला और मुस्लिम पुरूष से विवाह नही कर सकती है। किसी मुस्लिम महिला को तलाक मांगने के लिये निश्चित कारण बताने पड़ते है परन्तु पति बिना किसी उचित कारण के तलाक दे सकता है। महिला को पुर्नविवाह के लिये निश्चित समय (इदह) से गुजरना पड़ता है परन्तु पुरूष के लिये ऐसी कोई बाध्यता नही है वह तुरन्त विवाह कर सकता है। पुरूष और महिला एक साथ कोई सम्पति प्राप्त करते है तो पुरूष को महिला से दुगुना हिस्सा प्राप्त होगा यदि पति बिना बच्चो के मर जाता है तो पत्नि को संपति का चौथाई हिस्सा ही प्राप्त होगा। यदि बच्चे ह तो संपति का आठवंा हिस्सा कम हो जाता है। वास्तविक रूप से यह कानून यह रूढ़िवादी और संकीर्ण व्याख्या वाली सोच है जो महिलाओ को सदैव निम्न स्थिति में धकेलती है। इसमें पुरूषो को उच्च स्थान व अधिकार प्राप्त है जबकि महिलाओ को निम्न अधिकार व स्थान प्राप्त है।
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Cite Article: "भारत में मुस्लिम महिलाओ की स्थिति अवलोकन", International Journal for Research Trends and Innovation (www.ijrti.org), ISSN:2455-2631, Vol.8, Issue 1, page no.404 - 407, January-2023, Available :http://www.ijrti.org/papers/IJRTI2301060.pdf
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ISSN: 2456-3315 | IMPACT FACTOR: 8.14 Calculated By Google Scholar| ESTD YEAR: 2016
An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 8.14 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator
Publication Details: Published Paper ID: IJRTI2301060
Registration ID:189612
Published In: Volume 8 Issue 1, January-2023
DOI (Digital Object Identifier):
Page No: 404 - 407
Country: SIKAR, RAJASTHAN, INDIA
Research Area: Arts
Publisher : IJ Publication
Published Paper URL : https://www.ijrti.org/viewpaperforall?paper=IJRTI2301060
Published Paper PDF: https://www.ijrti.org/papers/IJRTI2301060
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